भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है, जहां करीब 23,000 ट्रेनें रोजाना चलती हैं इनमें पैसेंजर और गुड्स (मालगाड़ी) दोनों शामिल हैं। आपने सफर के दौरान कई बार देखा होगा कि कुछ ट्रेनों में एक नहीं, बल्कि दो इंजन लगे होते हैं एक आगे और एक पीछे। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्यों लगाए जाते हैं डबल इंजन?
ताकत और ट्रैक की जरूरतों के हिसाब से होता है इंजन का चुनाव
रेलवे इंजनों की पावर सामान्यतः 4000 से 8000 हॉर्सपावर तक होती है। लेकिन जब ट्रेन का भार ज्यादा हो, जैसे कि लंबी मालगाड़ियाँ या ऊंचाई वाली जगहों पर चढ़ाई वाले ट्रैक हों, तब एक इंजन से काम नहीं चलता। ऐसे में ट्रेन को ज्यादा ताकत की ज़रूरत होती है, इसलिए डबल इंजन लगाए जाते हैं।
हाल ही में रेलवे ने 9000 हॉर्सपावर का इंजन भी तैयार किया है, लेकिन उसके व्यापक इस्तेमाल से पहले डबल इंजन एक भरोसेमंद विकल्प बना हुआ है।
कहां होता है डबल इंजन का ज्यादा इस्तेमाल?
डबल इंजन का मुख्य उपयोग पहाड़ी इलाकों और ऐसे ट्रैक पर होता है, जहां चढ़ाई होती है। उदाहरण के लिए, मुंबई के घाट क्षेत्र में अक्सर डबल इंजन वाली ट्रेनें देखने को मिलती हैं। यहां की ढलान और ट्रैक की डिजाइन के कारण ट्रेन को ऊपर खींचने के लिए अतिरिक्त पावर की जरूरत होती है।
राजधानी और एक्सप्रेस ट्रेनों में क्यों नहीं?
हर ट्रेन में डबल इंजन नहीं लगाए जाते क्योंकि सभी ट्रेनों को इतनी ताकत की जरूरत नहीं होती। राजधानी, शताब्दी या पूर्वा एक्सप्रेस जैसी सुपरफास्ट ट्रेनों के कोच हल्के होते हैं और उनके रूट भी ऐसे होते हैं जहां ट्रैक सीधा और इलेक्ट्रिफाइड होता है। लेकिन फिर भी, कुछ एक्सप्रेस ट्रेनों में, खासकर जब उन्हें अतिरिक्त कोच जोड़ने होते हैं, डबल इंजन लगाए जाते हैं।
मालगाड़ियों में सबसे ज्यादा जरूरत
भारतीय रेलवे में चलने वाली मालगाड़ियों की संख्या काफी अधिक है और उनमें आमतौर पर कोयला, सीमेंट, स्टील, या आयरन जैसी भारी वस्तुएं ढोई जाती हैं। इनका वजन इतना ज्यादा होता है कि एक इंजन उन्हें खींचने में सक्षम नहीं होता। ऐसे में दो इंजन जोड़कर उनकी हॉर्सपावर को 8000 से 9000 तक किया जाता है, जिससे बिना रुकावट माल की ढुलाई हो सके।
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